Tuesday, May 19, 2009

जल ही जीवन है

जल ही जीवन है
जल से हुआ सृष्टि का उद्भव जल ही प्रलय घन है
जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है।।
शीत स्पर्शी शुचि सुख सर्वस
गन्ध रहित युत शब्द रूप रस
निराकार जल ठोस गैस द्रव
त्रिगुणात्मक है सत्व रज तमस
सुखद स्पर्श सुस्वाद मधुर ध्वनि दिव्य सुदर्शन है।
जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है।।
भूतल में जल सागर गहरा
पर्वत पर हिम बनकर ठहरा
बन कर मेघ वायु मण्डल में
घूम घूम कर देता पहरा
पानी बिन सब सून जगत में ,यह अनुपम धन है।
जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है।।
नदी नहर नल झील सरोवर
वापी कूप कुण्ड नद निर्झर
सर्वोत्तम सौन्दर्य प्रकृति का
कल॰॰कल ध्वनि संगीत मनोहर
जल से अन्न पत्र फल पुष्पित सुन्दर उपवन है।
जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है।।
बादल अमृत सा जल लाता
अपने घर आँगन बरसाता
करते नहीं संग्रहण उसका
तब बह॰बहकर प्रलय मचाता
त्राहि त्राहि करता फिरता ,कितना मूरख मन है।
जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है।।
शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

धरती माता

धरती माता
धन्य धन्य हे धरती माता
तुमसे ही जग जीवन पाता।.
धन्य धन्य हे धरती माता ।।
पृथिवी धरणी अवनि भू धरा
भूमि रत्नगर्भा वसुन्धरा
गन्धवती क्षिति शस्य श्यामला
जननी विविध नाम विख्याता।।
धन्य धन्य हे धरती माता ।।
अन्न पुष्प फल वृक्ष मनोहर
सरित सरोवर सागर निर्झर
स्वर्ग छोड़ करके ईश्वर भी
तेरी ही गोदी में आता।।
धन्य धन्य हे धरती माता ।।
जल पावक समीर आकाशा
गन्ध रूप रस शब्द स्पर्शा
सब पदार्थ तेरे आँचल में
जो जन जो चाहे पा जाता।
धन्य धन्य हे धरती माता ।।
शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

Wednesday, April 01, 2009

देख प्रकृति की ओर

देख प्रकृति की ओर
मन रे! देख प्रकृति की ओर।
क्यों दिखती कुम्हलाई संध्या
क्यों उदास है भोर।
देख प्रकृति की ओर।
वायु प्रदूषित नभ मंडल
दूषित नदियों का पानी
क्यों विनाश आमंत्रित करता है मानव अभिमानी
अंतरिक्ष व्याकुल-सा दिखता
बढ़ा अनर्गल शोर
देख प्रकृति की ओर।
कहाँ गए आरण्यक लिखने वाले
मुनि संन्यासी
जंगल में मंगल करते
वे वन्यपशु वनवासी
वन्यपशु नगरों में भटके
वन में डाकू चोर
देख प्रकृति की ओर।
निर्मल जल में औद्योगिक मल
बिल्कुल नहीं बहायें
हम सब अपने जन्मदिवस पर
एक-एक पेड़ लगाएं
पर्यावरण सुरक्षित करने
पालें नियम कठोर
देख प्रकृति की ओर
जैसे स्वस्थ त्वचा से आवृत
रहे शरीर सुरक्षित
वैसे पर्यावरण सृष्टि में
सब प्राणी संरक्षित
क्षिति जल पावक गगन वायु में
रहे शांति चहुँ ओर
देख प्रकृति की ओर।

Saturday, March 07, 2009

प्रेमिका और पर्यवेक्षक

प्रेमिका और पर्यवेक्षक

प्रेमी की प्रतीक्षा में
प्रेमिका के तीन मिनिट
परीक्षा हाल में पर्यवेक्षक के तीन घन्टे,
बराबर होते हैं तीन युगों के,
दोनों ही बेचैन, हैरान, परेशान,
घबराता दिल, आफत में जान,

दोनों ही अस्त, व्यस्त, त्रस्त,
बिना काम के अति व्यस्त,

बाहर शान्ति , मन में अशान्ति,
दोनों को अति॰महत्वपूर्ण होने की भ्रान्ति,

किं कर्तव्य विमूढ ,स्थिति शोचनीय,
काम पूरा का पूरा अत्यन्त गोपनीय,

रहते हैं बेकरार
प्रेमिका मिलने को ,
पर्यवेक्षक बिछुड़ने को,
कान खड़े ,चौकन्नी आँखें
लगाते चक्कर ,अगल॰बगल ताकें,

गंभीर मुद्रा , निष्ठुरता का प्रयास
अज्ञात भय ,परस्पर अविश्वास,

चिन्ता होती है॰
प्रमिका को आने वाले कल की
पर्यवेक्षक को नकल की,

बुरा लगता है॰

प्रेमिका को चालू रस्ता
पर्यवेक्षक को उड़न दस्ता,

बहुत सताती है॰
प्रेमिका को तन्हाई
पर्यवेक्षक को जम्हाई,

डर लगता है॰
प्रेमिका को अपने भाई से
पर्यवेक्षक को डी,पी,आई, से,

शिकायत है॰
प्रेमिका को अपने चितचोर से
पर्यवेक्षक को अपने चिटचोर से,

दोनों को रहती है॰
गुप्त पत्रों की तलाश
छुपा कर रखे गये हैं जो
बड़े जतन से वहीं कहीं आसपास,
प्रेमिका को
प्रेमी द्वारा प्रणय निवेदन की अर्जियाँ
पर्यवेक्षक को
गुड़ी माड़ी गाइड की पर्चियाँ,

करें क्या ?
कुछ बंधती नहीं सम्पट
दोनों को किसी के भी देख लेने का संकट,
मिलता है बाद में॰
प्रेमिका को आकाश से तारे तोड़ लाने का आश्वासन
पर्यवेक्षक को दस रुपये का नोट
और केन्द्राध्यक्ष का भाषण,

परीक्षा और प्रेम का स्तर
यदि इसी तरह गिरता जायेगा
तो भविष्य में एक दिन ऐसा भी आयेगा
प्रेमिका और पर्यवेक्षक
ऐसे गायब होंगे कि
जमाना ढूँढता रह जायेगा

Monday, February 02, 2009

देखो बसन्त आ गया

देखो बसन्त आ गया
सुनिये
पीत पीत हुए पात
सिकुड़ी सिकुड़ी सी रात
ठिठुरन का अन्त आ गया
देखो बसन्त आ गया ।

मादक सुगन्ध से भरी
पन्थ पन्थ आम्र मंजरी
कोयलिया कूक कूक कर
इतराती फिरस बबरी
जाती है जहाँ दृष्टि
मनहारी सकल स्रष्टि
लास्य दिग्दिगन्त छा गया
देखो बसन्त आ गया।

शीशम के तारुण्य का
आलिंगन करती लता
रस का अनुरागी भ्रमर
कलियों का पूछता पता
सिमटी सी खड़ी भला
सकुचायी शकुन्तला
मानो दुष्यन्त आ गया
देखो बसन्त आ गया।

पर्वत का ऊँचा शिखर
ओढ़े है किंशुकी सुमन
सरसों के फूलों भरा
मादक बासन्ती उपवन
करने कामाग्नि दहन
केशरिया वस्त्र पहन
मानों कोई सन्त आ गया
देखो बसन्त आ गया।।

Saturday, November 29, 2008

हिंसा

हिंसा

हिंसा ही यदि लक्ष्य हो गया जिस मानव का
पाठ अहिंसा का क्या कभी समझ पाएगा
कर हिंसा स्वीकार अहिंसा व्रत का पालन
हिंसा का ही तो परिपोषण कहलाएगा।
***



हिंसा की पीड़ा का अनुभव जिसे नहीं है
वही व्यक्ति तो खुलकर हिंसा कर पाता है
हिंसक मूढ, अहिंसा की भाषा क्या जाने
अपनी ही भाषा में व्यक्ति समझ पाता है।

***




नहीं करूँगा हिंसा और न होने दूँगा
ऍसा सच्चा अहिंसार्थ व्रत लेना होगा
हिंसा के जरिए यदि हिंसा कम होती है
व्यापक अर्थ अहिंसा का अब लेना होगा।

***



युद्ध


सत्य अहिंसा और शान्ति की रक्षा करने
अगर युद्ध भी होता है तो हो जाने दो
मातृभूमि की मर्यादा की रक्षा में यदि
अपना सब कुछ खोता है तो खो जाने दो
नहीं करेंगे इस पर कोई भी समझौता
महाप्रलय भी होता है तो हो जाने दो।

***




डर


दुनिया में जो कौम मौत से डर जाती है
सपने में भी वह सम्मान नहीं पाती है
दीन–हीन श्रीहीन दरिद्र निकम्मी बनकर
अपमानित होकर जीते जी मर जाती है।

***




शान्ति प्रस्ताव


शान्ति भंग करने की जिद जिसने ठानी है
उसे शान्ति– प्रस्ताव सरासर बेमानी है
लातों के देवता बात से नहीं मानते
भय बिन होय न प्रीति नीति हमने जानी है।
***

-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

Wednesday, September 10, 2008

साधारण इंसान


साधारण इंसान
सुनिये
मुझको नहीं बनाना दानव और न ही भगवान

मुझे बने रहने दो केवल साधारण इंसान।
दुनियाँ वालो अरे जग वालो
पाऊँ कला कुछ तुम खजूर पर इतना नहीं चढ़ाना
भूल जाऊँ अपनी ज़मीन और सीख जाऊँ इतराना
इतनी नहीं प्रशंसा करना आ जाए अभिमान
मुझे बने रहने दो केवल साधारण इंसान।
दुनियाँ वालो अरे जग वालो
पा जाऊँ कुछ ज्ञान नहीं पूजा की भंग पिलाना
खुद को खुदा समझने के दुष्भ्रम से मुझे बचाना
माला ले पीछे मत पड़ना मत करना सम्मान
मुझे बने रहने दो केवल साधारण इंसान।
दुनियाँ वालो अरे जग वालो
अच्छा लगूँ तो कुछ मत करना अच्छाई ले लेना
बुरा लगूँ तो अपनेपन से मुझे माफ़ कर देना
इतनी भी नफ़रत मत करना बन जाऊँ हैवान
मुझे बने रहने दो केवल साधारण इंसान।
दुनियाँ वालो अरे जग वालो
जो भी हूँ जैसा भी हूँ तुम दर्पण-सा दिखलाना
समझ सकूँ जिस तरह प्यार से कुछ ऐसे समझाना
जैसी की तैसी चादर रख जाऊँ हे भगवान!
मुझे बने रहने दो केवल साधारण इंसान।
दुनियाँ वालो अरे जग वालो

Sunday, August 31, 2008

कोसी को समर्पित

मित्रो यह स्तुति सन् १९९९ में नर्मदा की बाढ़ के समय लिखी थी कोसी को समर्पित कर रहा हूँ आशा है जल्दी शान्त होगी।

सुनिये
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।
ये तेरे विकराल रूप से मच गई ता ता थैया।।

खतरे को एलान सुनो सब निकर निकर के भागे
जित देखो उत पानी पानी महाप्रलय सो लागे।
देखत देखत घरई डूब गओ छत पै चल रई नैया।
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।

देख जरा वीरान हो गये ये तेरे तट वाले
भर बारिश में बेघर हो गये खाने के भये लाले
राशन पानी गओ पानी में बह गये नगद रुपैया।
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।

डूबे खेत सबई किसान की भई पूरी बरबादी
सड़ गये बिन्डा अब हुइहै कैसे बिटिया की शादी
थालत भैंस कितै बिल्ला गई कितै दुधारू गैया।
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।

कछू पेड़ पर सात दिनों से बैठे भूखे प्यासे
डरे डरे सहमे सहमे से बच्चे पूछें माँ से
कहाँ चलो गओ कक्का अपनों कहाँ चलो गओ भैया।
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।

हेलीकाप्टर को एरो सुन करके बऊ घबरा रई
कह रई बेटा मोहे लगत है मनों मौत मँडरा रई
सांप देख नत्थू चिल्लानो हाय दैया हाय दैया।
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।

अबहिं अबहिं तो भओथो गरमी में गोपाल को गोनों॔
नओ सुहाग को जोड़ा बह गओ और दहेज को सोनो
बाढ़ शिविर में सिमटी सिमटी बैठी नउ दुल्हैया।
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।

बुरे फसे पोलिंग आफीसर चिन्ता घर वालों में
डरे रिटर्निंग आफीसर से घुसे नदी नालों में
पीठासीन बागरा पहुंचो पेटी सोन तलैया।
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।

रात दिना सेवा में लग गये बचे पड़ोसी सारे
विपदा में भी राजनीति दिखला रहे कुछ बेचारे
चार पुड़ी में वोट मांग रहे यै नेता छुटभैया ।
मत बिफर नर्मदा मैया अब उतर नर्मदा मैया ।
शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

Friday, August 15, 2008

भारतभूमि

भारतभूमि


भारत की भूमि न्यारी स्वर्ग से भी ज्यादा प्यारी
देवता भी जन्म लेना चाहें मेरे देश में।
पर्वतों का राजा यहाँ नदियों की रानी यहाँ
धरती का स्वर्ग काश्मीर मेरे देश में।।
शिवाजी प्रताप चन्द्रशेखर भगतसिंह
लक्ष्मीबाई जैसी नई पीढ़ी मेरे देश में।
भारत महान था ये आज भी महान है
एक सिर्फ व्यवस्था की कमी मेरे देश में।।
2
दुनियाँ की पहली किताब अपने पास में है
अमृतवाणी देवभाषा संस्कृत अपने पास है।
पातञ्जल ध्यान योग गीता ज्ञान कर्मयोग
षटरस छप्पन भोग भी अपने पास है।
आयुर्वेद धनुर्वेद नाट्यवेद अस्त्र शस्त्र
यन्त्र तन्त्र मन्त्र का भी लम्बा इतिहास है
पढ़े लिखे ज्ञानी सब बैठे हैं अँधेरों में और
लालटेनें सभी निरे लल्लुओं के पास हैं।।
3
बढ़े अपराध दिन दूने रात चौगुने हैं
लगी है पुलिस सब चोरों की सुरक्षा में
राष्ट्रनिर्माता ज्ञाता वोटरलिस्ट बनाता
नई पीढ़ी मक्खी मारे बैठी बैठी कक्षा में।
न्यायविद सरेआम बेच रहे संविधान
गुण्डे अपराधियों की खड़े प्रतिरक्षा में
भारत की भोली भाली जनता है आस्तिक
बैठी किसी नये अवतार की प्रतीक्षा मे

4

खेत जिसके पास में है सर्विस की तलाश में है
सर्विस वाले घूमते दूकान की तलाश में।
ग्राहक को ठगने की ताक में दूकानदार
ग्राहक भी उधार लेके खाने के प्रयास में।
बड़े पेट वाले बीमार हैं अधिक खा के
श्रमिक बेचारे खाली पेट उपवास में।
डाकू चोर किन्नर आसीन राजगद्दियों पे
चन्द्रगुप्त चाणक्य गये वनवास में।।

सींकचों के पीछे खड़े जिन्हें होना चाहिये था
ओढ़के मुखौटा आज बैठे हैं सदन में।
गाँधी जी की जय जयकार करके करें भ्रष्टाचार
जयन्ती मनायें एयरकंडीशन भवन में।
सत्य का तो अता नहीं त्याग का भी पता नहीं
मन में वचन में न दिखे आचरण में।
बुद्ध फिरें मारे मारे बुद्धू सारे मजा मारें
प्रबुद्ध युवा बेचारे पड़े उलझन में।।
शास्त्री नित्यगोपअल कटारे

Saturday, August 09, 2008

वर्षा ॠतु आई

सुनिये

जब ग्रीष्म ॠतु गई और वर्षा ॠतु आई
तब हम बिल्कुल फालतू थे
इसलिये एक कविता बनाई
और एक बड़े कार्यक्रम में
तबियत से गाकर सुनाई
बदरा घिर आये रुत है भीगी॑ भीगी
नाचे मन मोरा मगन ताका धीगी धीगी
बीच में बैठे एक श्रोता से नहीं रहा जा रहा था
उससे वर्षा ॠतु का पारम्परिक वर्णन नहीं सहा जा रहा था
फिर भी हमने की बेहयाई
अपनी कविता और भी आगे बढ़ाई
सावन का महीना पवन करे शोर
जियरा रे ऐंसे झूमे जैसे वन में नाचे मोर
अब श्रोता हो गया था बिल्कुल बोर
वह चिल्लाया अबे चुप चोर!
एक घंटे से सुनी सुनाई कविता वाँच रहा है
हम मरे जा रहे हैं और तेरा जियरा नाच रहा है
बिना सोचे समझे क्या ऊटपटांग लिखता है
इतना वाहियात मौसम तुझे सुहाना दिखता है
यदि तुझे सचमुच आता है वरसात में मजा
तो जरा हाउसिंग बोर्ड में अजा
घुसते ही तथाकथित ऐतिहासिक सड़क में फस जायेगा
और जरा सा बहका तो
स्कूटर समेत नाली में धस जायेगा
फिर तेरा मन नाच नहीं कूद कूद जायेगा
दूरदर्शन पर वरसात की भविष्यवाणी से ही
सारी कविता भूल जायेगा
खिड़की से पवन के झोंके की जगह
सांप की फुफकार सुनोगे तो तबियत हिल जायेगी
और कहीं चपेट में आ गये तो
कविता के साथ साथ कवि से भी मुक्ति मिल जायेगी
यदि लिखना है तो लिखो हालात सच्चे
तुम मोर नाचने की बात करते हो
जबकि नाच रहे हैं सुअर के बच्चे
टूटे सेप्टिक टेंक की गन्दगी
जो वाकी समय सड़क के किनारे वहती थी
अब वरसात की कृपा से
दरवाजे तक आ जाती है
और हरियाली के साथ साथ चारों ओर
गन्दगी ही गन्दगी छा जाती है
हमें पता ही नहीं
कैसी होती है मिट्टी की गन्ध ?
यहाँ तो व्याप्त हो जाती है
सिनेटरी लाईन की दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध
माना कि वरसात की बूँदें
प्रेमियों को अच्छी लगती हैं
बशर्ते वे घंटे दो घंटे गिरें
बादलों से भी शिकायत नहीं
वे घिरें तो घिरें उनका स्वागत है
पर आपको नहीं मालूम श्रीमान !
यह हाउसिंग बोर्ड का छत है
बादल तो पन्द्रह मिनिट बरस कर चला जाता है
परन्तु यह हरामजादा छत
उसे पन्द्रह घंटे तक टपकाता है
अँधेरी रात स्ट्रीट लाईट बन्द
घनघोर वारिश में और भी कई दन्द फन्द
इस सींड़े मौसम में न खा पाते हैं
न सो पाते हैं
सच पूछिये तो वरसात के नाम पर
हमारे कटारे खड़े हो जाते हैँ

Saturday, February 09, 2008

सौ०का० श्वेता चि० ऋषि विवाहावसरे

suniye
सौ०का० श्वेता चि० ऋषि विवाहावसरे शुभकामना संदेशः
\
श्वेता ऋषिः विवाह प्रणय अनुबन्धम्।
शुभं भवतु ॠषि कृत प्राचीन प्रबन्धम्।।
भारतीय ॠषियों द्वारा अनुप्रणीत सामाजिक प्रबन्धन के अनुसार श्वेता और ऋषि का विवाह शुभ और कल्याण प्रद हो।
भारतीय संस्कृत्यनुसारं शुचि षोडष संस्कारम्।
श्रेष्ठाश्रमं गृहस्थ आश्रमं सदाचरण व्यवहारम्।
सप्तपदी मैत्री कृतवन्तौ सप्त सम्बन्धम्।।
भारतीय संस्कृति में पवित्र सोलह संस्कार एवं चार आश्रमों की व्यवस्था देकर सदाचरण और सद्व्यवहार की प्रेरणा दी गई है। जिसमें गृहस्थ आश्रम को सर्व श्रेष्ठ माना गया है। इस आश्रम में प्रवेश करते समय सात परिक्रमा साथ साथ करके पति पत्नी सात जन्मों के संबन्ध तय करते हैं।
मंगल कलशः मृत्तिका दीपं तोरण द्वार पुनीतम्।
हरित्पत्र मण्डपाच्छदनं मन्त्रं मंगल गीतम्।
शुभं हरिद्रा युक्त चन्दनं व्याप्तं दिव्य सुगन्धम्।।
समारोह में मंगल कलश मिट्टी के दिये पवित्र तोरण द्वार बनाकर हरे पत्तों से युक्त मण्डप के नीचे मन्त्रोच्चार और मधुर गीतों से वातावरण उल्लासमय हो गया है।शुभ हल्दी युक्त चन्दन की सुगन्ध सारे वातावरण में व्याप्त है।
स्थितौ नव वर वधू मण्डपे नीत्वा निज जयमालाम्।
राम जानकी वत् शोभेते जनकपुरी मिथिलायाम्।
दृष्ट्वा संमनोहरं दृश्यं प्राप्नुवन्ति आनन्दम्।।
इस पवित्र मण्डप में अपने हाथों में जयमाला लिये खड़े ये नव युगल उसीतरह शोभित हो रहे हैं जैसे जनकपुरी मिथिला में राम और जानकी शोभायमान हैं। ऐंसे मनोहर दृश्य को देखकर समस्त एकत्रित बन्धु बान्धव आनन्दित हो रहे
पितरौ गायत्री रामेश्वर दुबे सहित परिवारम्।
इष्टमित्र चातिथिभिर्सहितं प्रमुदति बारं
सर्वे कन्यादानं कृत्वा प्राप्नुवन्ति आनन्दम्।.
कन्या के माता पिता श्रीमती गायत्री दुबे एवं श्री रामेश्वर दुबे का परिवार अपने इष्टमित्र और मेहमानों के साथ कन्यादान करके आनन्दित हो रहे
सर्वैषु दानेसु उत्तमं उक्तं कन्यादानम्।
अन्यं दानं क्षणं क्षीयते धनमन्नं सम्मानम्।
वरस्य पिता श्री गंगाप्रसाद मिश्रः प्रहसति मन्दं मन्दम्।
समस्त प्रकार के दानों में कन्यादान को श्रेष्ठ कहा गया है।क्यों कि अन्न धन आदि सभी दान बहुत शीघ्र समाप्त हो जाते हैं जबकि कन्यादान से कुल बढ़ता ही जाता है। इस प्रकार का श्रेष्ठ दान प्राप्त करके वर के पिता श्री गंगाप्रसाद मिश्र जी मन्द मन्द मुस्कुरा रहे
खलु भवेत् नव युगल जीवने सत्यं ज्ञान प्रकाशः।
वर्धयेन्नित्यं परस्परं प्रेम त्याग विश्वासः।
काम क्रोध लोभ संमोहाः प्रमुच्येत् भव बन्धम्।।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि इस नव दम्पति के जीवन में सत्य और ज्ञान का प्रकाश हो और हमेशा परस्पर प्रेम त्याग और विश्वास बढ़ता रहे। ये काम क्रोध लोभ मोह आदि बन्धनों से मुक्त होकर अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त करें।
शुभाकांक्षी
शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

Monday, December 31, 2007

नूतन वर्ष की शुभ कामना

suniye
नया वर्ष कुछ ऐंसा हो पिछले बरस न जैसा हो
घी में उँगली मुँह में शक्कर पास पर्श में पैसा हो ।

भूल जायें सब कड़बी बातें पायें नयी नयी सौगातें
नहीं काटना पड़ें वर्ष में बिन बिजली गर्मी की रातें।
कोई घपला और घुटाला काण्ड न ऐंसा वैसा हो ।।
नया वर्ष कुछ ऐंसा हो ॑॑॑॑॑॑॑

बच्चे खुश हों खेलें खायें रोज सभी विद्यालय जायें
पढ़ें लिखें शुभ आदत सीखें करें शरारत मौज मनायें
नहीं किसी के भी गड्ढ़े में गिरने का अंदेशा हो ।।
नया वर्ष कुछ ऐंसा हो ॑॑॑॑

युवा न भटकें गलियां गलियां मिल जायें सबको नौकरियां
राहू केतु शुभ हो जायें मिल जायें सबकी कुण्डलियाँ
लड़की ऐश्वर्या सी लड़का अभिषेक बच्चन जैसा हो।।
नया वर्ष कुछ ऐंसा हो ॑॑॑॑

स्वस्थ रहें सब वृद्ध सयाने बच्चे उनका कहना मानें
सेवा में तत्पर हो जायें आफिस कोर्ट कचहरी थाने
डेंगू और चिकनगुनियां का अब प्रतिबन्ध हमेशा हो ़़
नया वर्ष कुछ ऐंसा हो ॑॑॑॑

नये वर्ष में नूतन नारे बना सकें नेता बेचारे
गाली बकलें कोई किसी को पर जूते चप्पल न मारे
नहीं विश्व में अन्त किसी का बेनजीर के जैसा हो ।.
नया वर्ष कुछ ऐंसा हो ॑॑॑॑

Tuesday, August 14, 2007

कलियुगी रामलीला

रावण के प्रति हनुमान का उदार भाव देखकर
रामलीला का मैनेजर झल्लाया
हनुमान को पास बुलाकर चिल्लाया
क्यों जी ? तुम रामलीला की मर्यादा तोड़ रहे हो
अच्छी ख़ासी कहानी को उल्टा किधर मोड़ रहे हो?
तुम्हें रावण को सबक सिखाना था
पर तुम उसके हाथ जोड़ रहे हो
हनुमान बना पात्र हंसा और बोला
भैया यह त्रेता की नहीं कलियुग की रामलीला है
यहाँ हर प्रसंग में कुछ न कुछ काला पीला है
मैं तो ठहरा नौकर मुझे क्या रावण क्या राम
जिसकी सत्ता उसका गुलाम
आजकल हमें जल्दी जल्दी मालिक बदलना पड़ता है
इसीलिए राम के साथ साथ
रावण से भी मधुर संबंध रखना पड़ता है
मुझे अच्छी तरह मालूम है कि
यह रावण मरेगा तो है नहीं
ज्यादा से ज्यादा स्थान बदल लेगा
वह राम का कुछ बिगाड़ पाए या नहीं
किन्तु मेरा तो पक्का कबाड़ा कर देगा
अतः रावण हो या राम
हमें तो बस तनख्वाह से काम
जैसे आम के आम और गुठलियों के दाम
मैं ही नहीं सभी पाखंडी चालें चल रहे हैं
समय के हिसाब से सभी किरदार
अपनी भूमिका बदल रहे हैं
अब विभीषण को ही देखिए
कहने को तो रावण ने उसे लात मारी थी
पर वह उसकी राजनैतिक लाचारी थी
देखना अब विभीषण इतिहास नहीं दोहराएगा
मौका मिलते ही राम की सेना में दंगा करवाएगा
अब कुंभकर्ण भी फालतू नही मरना चाहता
फ्री की खाता है और
कोई काम भी नहीं करना चाहता
उसे अब नींद की गोली खाने के बाद भी
नींद नहीं आती
फिर भी जबरन सोता है
पर सोते हुए भी लंका की हर गतिविधि से वाकिफ होता है
इस बार उसकी भूमिका में भी परिवर्तन हो जाएगा
कुंभकर्ण लड़ेगा नहीं
जागेगा .खाएगा पिएगा और फिर सो जाएगा
अब अंगद में भी

आत्मविश्वास कहाँ से आएगा?
उसे मालूम है कि पैर अब
पूरी तरह जम नहीं पाएगा
कौन जाने भरी सभा के बीच
कब अपने ही लोग टाँग खींच दें
इसलिए उसे हमेशा युवराज बने रहना मंजूर नहीं है
यदि बालि कुर्सी छोड़ दे तो दिल्ली दूर नहीं है
वह अपनी सारी नैतिकता को
जमकर दबोच रहा है
आजकल वह बाली को खुद मारने की सोच रहा है
वह राजमुकुट अपने सिर पर धरना चाहता है
और बचा हुआ सुग्रीव का रोल खुद करना चाहता है
बूढ़े जामवंत भी अब थक गए हैं
अपने दल के अनुशासनहीन बंदरों के वक्तव्य सुनकर कान पक गए हैं
अब जामवंत का उपदेश नहीं सुना जाएगा
इस बार दल का नेता
कोई चुस्त चालाक बंदर चुना जाएगा
सुलोचना को भी
भरी जवानी में सती होना पसंद नहीं है
कहती है
साथ जीने का तो है पर मरने का अनुबंध नहीं है
इसलिए अब वह मेघनाद के साथ सती नहीं हो पाएगी
बल्कि उसकी विधवा बनकर
नारी जागरण अभियान चलाएगी
जटायु को भी अपना रोल बेहद खल रहा है
वह भी अपनी भूमिका बदल रहा है
अब वह दूर दूर उड़ेगा
रावण के रास्ते में नहीं आएगा
अपना फर्ज तो निभाएगा पर
अपने पंख नहीं कटवाएगा
मारीच ने भी अपने निगेटिव रोल पर
गंभीरता से विचार किया है
उसने सुरक्षा के लिए
बीच का रास्ता निकाल लिया है
वह सोने का मृग तो बनेगा
पर अन्दर बुलेटप्रूफ जाकिट पहनेगा
राम का बाण लगते ही गिर जाएगा
लक्ष्मण को चिल्लाएगा और धीरे से भाग जाएगा
अभी परसों ही शूर्पनखा की नाक कटी है
बड़ी मुश्किल से
अपनी जिम्मेदारी निभाने से पीछे हटी है
पर भूलकर भी यह मत समझना कि
अब वह दोबारा नहीं आएगी
कटी नाक लेकर अब वह
लंका नहीं सीधे अमेरिका जाएगी
किसी बड़े अस्पताल में प्लास्टिक सर्जरी करवाएगी
और नया चेहरा लेकर फिर एक बार
अपनी भूमिका दोहराएगी
यूँ तो शूर्पनखा के कारनामे जग जाहिर हैं
पर करें क्या
खर और दूषण राम की पकड़ से बाहर हैं
यदि शूर्पनखा से बचना है तो
उसकी नाक नहीं जड़ें काटना होगी
अब लक्ष्मण को बाण नहीं तोप चलानी होगी
ऐसी परिस्थिति में राम को भी
मर्यादा के बंधन छोड़ना पड़ेंगे
रावण को मारना है तो
सारे सिद्धांत छोड़ना पड़ेंगे
shastri nityagopal katare

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Monday, June 25, 2007

फूल खिले अमलताश के

सुनिये

सखि! आये दिन गर्मी तपास के
फूल खिले अमलताश के ।।

कैसो मौसम हो गयो बैरी
काटे कटती नहीं दुपहरी
सूरज बन के बैठो पहरी
मीत लगें घने पेड़ आसपास के।
फूल खिले अमलताश के ।।

कैसी मौसम की मजबूरी
भावे हलुआ खीर न पूरी
रहती हरदम प्यास अधूरी
देह दुबली सी भई बिन प्रयास के।।
फूल खिले अमलताश के ।।

पूरी नींद न होय हमारी
आँखें हो गयीं भारी भारी
कैसे कैसे रात गुजारी
भये सैंयाँ भी ऊपर पचास के।
फूल खिले अमलताश के ।।

Sunday, May 27, 2007

katare video clip

लागे मंत्री पद नीको

माधव मुरारे (कृष्ण स्तुति संस्कृत )

लालू बहुत खिजाबे ( होली गीत )

मनमोहना बड़े झूटे ( होली गीत )

आगच्छ्न्तु नर्मदा तीरे ( संस्कृत में नर्मदा स्तुति )

हे सखी पति गृह गमनम

प्रेषितम न किंचित संदेशम हां गत: प्रियतम: विदेशम ( संस्कृत लोकगीतम)

पंडित भवानी प्रसाद मिश्र की कविता गीतफरोश की संगीत मय प्रस्तुती

अब गाँव चलो मोरे सैंयाँ





Tuesday, April 03, 2007

पार्षद, पुलिस और पिटाई

पार्षद, पुलिस और पिटाई
पुलिस की पिटाई से प्रताड़ित पार्षद, पैरों में पट्टी बाँधे हुए प्रात: पंडित जी के पास पहुँच कर प्रणाम करके पूछने लगे- । हे पंडित प्रकाण्ड कृपा पूर्वक हमारी जन्म पत्रिका को पढ़कर बताइये कि इसमें ऐसे कौन से क्रूर ग्रह हाथ धोकर पीछे पड़े हैं? जो परम पवित्र प्रजातांत्रिक पद्धति से, निष्पाप भावना के साथ, मतदान रूपी पुण्य कार्य करते हुए, पुलिस की पिटाई से हम इस दुर्गति को प्राप्त हुए?
वे जानते थे कि पं० विपन्न बुद्धि ज्योतिष के मामले में प्रकाण्ड विद्वानों में किसी से कम नहीं हैं। कौन कौन से पाप ग्रह वक्र दृष्टि से किस राशि को घूर रहे हैं? कौन सा उच्च राशि का ग्रह नीच राशि में किस तरह प्रवेश कर रहा है? यह उनको नंगी आँखों से बिल्कुल साफ साफ दिखाई देता है। इसी आधार पर वे भैंस गुमने से लेकर प्रधानमंत्री के कार्य काल तक की भविष्य वाणी कर डालते हैं। चुनाव प्रकरण में तो वे हारने या जीतने का दावा करने में सिद्धहस्त हैं।
कौन ग्रह किसकी छाया में पड़ रहा है? ऐसी स्थिति में कौन किसको पटकनी दे देगा? वे कुण्डली चक्र खींचकर बड़े सूक्ष्म ढंग से विवेचना करते हैं। इसके कारणों पर भी प्रकाश डालते हैं।
पार्षद गण भी इस पिटाई के कारणों पर प्रकाश डलवाने के लिये पं० विपन्न बुद्धि के पास आये थे। उनका कहना था कि पुलिस के पास डण्डा, चोर बदमाशों के लिए होता है किन्तु उन पर तो पड़ ही नहीं रहा, ऊपर से हम जैसे साहूकारों पर कैसे पड़ा? इस गूढ़ रहस्य को प्रकट करने का प्रयास कीजिये।
विपन्न बुद्धि ने प्रसन्नता पूर्वक अपने पुराने पोथी पत्रा निकाले और लगे उँगलियों पर गिनने, मेष, वृषभ, मिथुन..............।
अन्तर्दशा, महादशा आदि निकाल कर पार्षदों की पिटाई प्रकरण पर कुछ इस तरह से भविष्य कथन करने लगे-
हे पीड़ित पार्षद गण! इस पृष्ठ भूमि में तुम्हारा कुछ भी दोष नहीं है।, यह तो ग्रह नक्षत्रों के परिभ्रमण से उत्पन्न परिस्थितियों का परिणाम है। ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से इस सहस्राब्दी के प्रारम्भ में कन्या राशि पर राहु और केतु की वक्र दृष्टि पड़ रही है। और कन्या राशि में 'प` अक्षर प्रमुख होता है, इस लिए 'प` अक्षर से प्रारम्भ होने वाले पदों पर प्रतिपल प्रभाव पड़ने की प्रबल संभावना बनती है। प्रजातंत्र, प्रतिनिधि, पंच, पार्षद, पत्रकार, प्राचार्य, प्राध्यापक, पर्यटक और प्रगतिशील लेखक आदि प्रमुख पदों पर प्रतिष्ठित प्रतिनिधियों के लिए यह वर्ष प्रताड़ना देने वाला होगा। कन्या राशि को कन्या राशि के द्वारा ही प्रताड़ित होने का योग है। अब पुलिस की भी कन्या राशि है, पब्लिक की भी कन्या राशि है, और पिटाई की भी। इसलिए उपर्युक्त राशि वालों की पुलिस या पब्लिक द्वारा पिटाई का महायोग बनता है।
अब चूँकि भारत की पब्लिक अभी पूर्ण प्रबुद्ध नहीं हुई है अत: यह परम पुनीत कार्य फिलहाल पुलिस को ही सम्पन्न करना पड़ेगा। अत: हे पार्षद गण! आप अपनी पुलिस पिटाई को विधि का विधान समझ कर सहन करो, और अपने अन्त:करण को पवित्र करने का प्रयास करो। अभी कुछ दिन पहले अपने प्रदेश के प्रधान नेता से मिलने जा रहे सोहागपुर के पार्षदों को भी किसी बहाने पुल के पास पटक दिया, बेचारे दर्शन की तमन्ना लिए अस्पताल में पड़े हैं।
अभी तो पंचायत के चुनाव होने हैं, उसमें भी यत्र तत्र पिटाई का योग सुस्पष्ट दिखाई दे रहा है। कई पुराने पंचों को चुनाव पार्टी से पिटने का योग है तो कई प्रतिनिधियों को अन्य प्रतिनिधियों द्वारा पिटने की संभावना दिखाई देती है। पीठासीन और पोलिंग आफीसरों को पोलिंग एजेंटों से पिटने के लिए अपनी पीठ को पुष्ट कर लेना चाहिए और हनुमान चालीसा आदि के पाठ करने से कुछ रक्षा की उम्मीद की जा सकती है। अब रहा तुम्हारा दूसरा प्रश्न- कि चोरों को पुलिस का डण्डा क्यों नहीं पड़ रहा? सो उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि ज्योतिष का एक सूत्र है 'द च मीन
` अर्थात 'द` अक्षर और 'च` अक्षर की मीन राशि होती है।
इस हिसाब से चोरों की मीन राशि बनती है और प्रदेश की कुण्डली के केन्द्र में गुरु भी मीन राशि का बैठा है। अत: गुरु को चोरों का और चोरों को गुरु का संरक्षण मिलना स्वाभाविक है। ऐसी परिस्थिति में चोरों, चमचों, चालाक, चुगलखोरों, चापलूसों, चालबाज, चालू पुर्जा और चौधराहट वालों को अपने अपने कार्यों में अत्यधिक सफलता मिलने से कोई नहीं रोक सकता। अत: आप लोग शान्तचित्त होकर अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा कीजिये। पं० विपन्न बुद्धि का ज्योतिषीय विश्लेषण सुनकर पार्षद गण परम संतुष्ट होकर अपने पीड़ित अंगों में पुन: पट्टी बँधवाने अस्पताल की ओर प्रस्थान कर गए।
०००

Wednesday, March 21, 2007

संविधान समीक्षा और उनकी चिन्ता

संविधान समीक्षा और उनकी चिन्ता
जब से सरकार ने संविधान की समीक्षा करवाने का निर्णय लिया है, तभी से विपन्न बुद्धि बहुत उत्साहित है। उसका कहना है कि पचास वर्ष बाद ही सही हमारे परम विशिष्ट ग्रंथ की समीक्षा हो तो रही है। हमारे देश में पुस्तकों की समीक्षा करने की पुरानी परंपरा है। हमारे साहित्यकार गण पच्चीस पृष्ठ की पुस्तक लिखकर इतनी समीक्षाएँ करवाते हैं कि उनसे एक हजार पृष्ठों वाला समीक्षा ग्रंथ तैयार हो जाये। ऐसे देश में इतने महान संविधान जैसे ग्रंथ की समीक्षा न हो पाना एक आश्चर्य ही है। वह तो अच्छा हुआ कि एक साहित्यकार के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाने से ही यह समीक्षा का अत्यावश्यक शुभ कार्य हो पा रहा है।
कितना अच्छा होगा जब विशेषज्ञ लोग इस महान ग्रंथ के न समझ में आने वाली शब्दावली की व्याख्या करेंगे। पर एक बात समझ में नहीं आ रही कि कुछ लोग कह रहे हैं- "यदि संविधान की समीक्षा हुई तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे।, संविधान से छेड़छाड़ हम बरदास्त नहीं करेंगे।"
कोई कह रहा है - "वर्तमान संसदीय प्रणाली की समीक्षा कतई स्वीकार नहीं।" आखिर क्या हो गया है इनको? समीक्षा से इतना डर क्यों? समीक्षा तो समीक्षा है, इसे मानना न मानना आपकी मर्जी की बात है। पर सुन तो लो, केवल समीक्षा से क्या बनने बिगड़ने वाला है? यह तो सभी जानते हैं कि यह मिली जुली सरकार जब अपना कोई विधान नहीं बना सकती, तो संविधान क्या बदल पाएगी? उन्हें अपना चुनावी वायदा तो पूरा करने दो।
हमने कहा- विपन्न बुद्धि! इतनी मोटी बात भी तुम्हारे पल्ले नहीं पड़ती? विरोध करने वालों को जरा ध्यान से देखो तो उनके विरोध करने का औचित्य बिल्कुल स्पष्ट समझ में आ जाएगा। जिन लोगों ने करोड़ों का घोटाला किया है, उन्हें सारी दुनिया जानती है, पुलिस भी पहचानती है, न्यायाधीश भी जानते हैं और सरकार को भी मालूम है। फिर भी वे हेलीकॉप्टर में बैठकर शान से घूम रहे हैं। किसकी कृपा से.....? संविधान की कृपा से ही तो वे बचे हैं, क्यों कि हमारा महान उदार संविधान चाहता है कि सौ अपराधी भले ही छूट जायें पर एक भी निरपराध को सजा नहीं मिलनी चाहिए।
अब समीक्षा होगी तो पता चलेगा कि सौ अपराधी तो छूट रहे हैं पर हजारों निरपराध लोगों को सजा बरावर मिल रही है। रोज सैकड़ों निरपराध लोगों की हत्या हो रही है, उनके घर जलाये जा रहे हैं, उन्हें लूटा जा रहा है। हमारा संविधान निरपराधों को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पा रहा है। किन्तु अपराधियों की सुरक्षा के प्रति पूर्ण सजग दिखाई देता है। अभी हाल में कुछ अपराधियों द्वारा पुलिस के तेईस जवान मौत के घाट उतार दिए गए, उन्होंने क्या अपराध किया था? यहाँ संविधान चुप बैठा रहता है, पर उन हत्यारों को पुलिस थाने में लाकर एक तमाचा भी मार दे तो संविधान उनकी सुरक्षा में खड़ा हो जाएगा। हजारों काश्मीरी पंडित अतिवादियों के अमानवीय अत्याचारों से पीड़ित होकर वर्षों से दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। संविधान उनकी क्या मदद कर रहा है? किन्तु उन राक्षसों पर जरा सा भी बल प्रयोग होता है तो संविधान दृढ़ता पूर्वक उनका बचाव करता है।
हमारा संविधान पारस मणि की तरह समदर्शी है, उसे पूजा के लोहे और बधिक के लोहे में कोई भेद नहीं है। जो भी संसर्ग में आयेगा, सोना हो जाएगा। इसीलिए वह 'अर्द्ध त्यजेत स: पंडित
` की भावना से यदि मरने वाले को नहीं बचा पाता तो मारने वाले को बचा लेता है..........लुटने वाले को न बचा पाया तो लूटने वाले को बचा लेता है,............अत्याचार न रुका तो अत्याचारी को बचा लिया। कहा भी गया है- "गतं न शोचामि कृतं न मन्ये" जो काम हो चुका है उसके विषय में क्या सोचना? जैसे दिन दहाड़े एक व्यक्ति की हत्या हो गई, तो अब मरने वाला तो मर ही गया, उसके विषय में क्या सोचना? पर जो मारने वाला है उसे तो बचा ही सकते हैं। फिर सारी प्रक्रिया उसके पक्ष में ही चलती है। ऐसे में वे सारे अपराधी जिस संविधान की कृपा से समाज को ठेंगा दिखाकर अपराध में लिप्त रहते हुए 'दिन दूनी रात चौगुनी ` प्रगति कर रहे हों, वे क्यों चाहेंगे कि संविधान की समीक्षा हो?
हमारा संविधान 'वसुधैव कुटुम्बकम्` की उच्च भावना रखता है। उसकी दृष्टि में स्वदेशी और विदेशी की संकीर्णता नहीं है। वह विदेशियों को भी भारत का कर्णधार बनने की इजाजत देता है। जिसके कारण कई विदेशी नागरिक भी भारत का प्रधान मंत्री बनने का सपना देख रहे होंगे। वे जानते हैं कि भारत में विदेशी चकाचौंध के मानसिक गुलामों की संख्या भी कम नहीं है, जो विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने, विदेशी भाषा बोलने यहाँ तक कि विदेशी कुत्ता पालने में गौरव अनुभव करते हैं। और यदि पत्नी भी विदेशी मिल जाये तो फिर बात ही क्या है? ऐसे लोग क्यों चाहेंगे कि इसकी समीक्षा हो।
कुछ लोगों को डर है कि वर्तमान संसदीय प्रणाली में कोई परिवर्तन न हो जाये। यह सभी जानते हैं कि संसदीय प्रणाली एक तमाशा बन गई है। चुनाव के दौरान सैकड़ों लोगों की हत्या, मतपेटियों की लूटपाट की घटनाओं से पता चलता है कि संसदीय प्रणाली में अपराधियों का प्रवेश ही नहीं, वर्चस्व हो गया है। संसद में जूते चप्पल चलना, कपड़े फाड़ना, एक दूसरे को गालियाँ देना आम बात हो गई है। अब कोई शरीफ आदमी जिसके पास कालाधन न हो, आसपास गुण्डे बदमाश न हों वह चुनाव लड़ने का विचार नहीं कर सकता।
घोटाले इसी प्रणाली की देन हैं। अभी तक जितने घोटाले प्रकाश में आ गये हैं, उन्हीं की रकम जोड़ी जाये, वो हम विश्व बैंक को भी ऋण देने की स्थिति में होंगे।
जनता इस प्रणाली से इतनी ऊब गई है कि अब वह किन्नरों को चुनने लगी है। कम से कम उनसे कोई खतरा तो नहीं है। यदि यह प्रणाली ऐसे ही चलती रही, तो अगले कुछ वर्षों में कोई हिस्ट्रीशीडर संसद का नेता, और किन्नर विपक्ष का नेता बनेगा। इसलिए विपन्न बुद्धि! तुम्हें अधिक खुश होने की आवश्यकता नहीं है। एक तो ये लोग समीक्षा होने नहीं देंगे, और यदि हुई भी तो हमेशा के गठित आयोगों जैसा इसका भी परिणाम होगा।
०००

Friday, March 09, 2007

समर्थन के प्रकार

समर्थन के प्रकार
आज अपने दरवाजे पर वंश परंपरागत प्रकृत शत्रु पड़ोसी विपन्न बुद्धि को खड़ा देखकर मेरे मन में तरह तरह के कुविचार दूरदर्शन के विज्ञापनों की भाँति एक एक करके आने लगे। उसे 'क्लोजअप टूथपेस्ट` के विज्ञापन के सलीम की तरह बेवजह दाँत निपोरते देख एक बार मन में आया कि एक ही घूँसे में इसे वेदान्ती बना दूँ, पर भला हो भारतीय संस्कारों का जो घर आये नितान्त धूर्त अतिथि को भी दण्डित करने से रोक देते हैं।
मैंने भी 'अतिथि देवो भव` का स्मरण कर अपने आप को संयत करते हुए कहा- "आओ विपन्न बुद्धि! ऐसी कौन सी बुरी सूचना है, जिसे देने तुम अपने पूर्व सम्बन्धों को भूलकर ब्रह्ममुहूर्त में मेरे घर आ खड़े हो।" विपन्न बुद्धि फिल्मी खलनायक की तरह अति आत्म विश्वास के साथ बोला- "मित्र मैं आज कुछ देने नहीं, कुछ माँगने आया हूँ।"
मित्र` और 'माँगने` इन दो शब्दों से किसी अनिष्ट की आशंका से ग्रस्त मेरा मस्तिक कम्प्यूटर की गति से सोचने लगा। जिस व्यक्ति से दुश्मनी के अलावा कोई संबन्ध ही न रहा हो, वह 'मित्र ` कह रहा है। और जिससे गालियों के अलावा कभी कुछ आदान प्रदान ही न हुआ हो, वह माँग रहा है। अवश्य कोई षड़यन्त्र रचा जा रहा है। "भला मुझसे क्या चाहते हो, विपन्नबुद्धि! "- मैंने अपने आंतरिक भावों को घुटालों की तरह छुपाते हुए कहा।
"मैं तुम्हारा समर्थन माँगने आया हूँ।"- विपन्न बुद्धि दार्शनिक अंदाज में बोला।
"समर्थन?" तुम होश में तो हो?......अरे भाई! वर्षों से हमारी सारी राजनीति एक दूसरे के विरोध पर टिकी है, ऐसे में समर्थन की बात करना , क्या हमारे अस्तित्व को संकट में डालना नहीं होगा?
"जानता हूँ मित्र........पर मरता क्या नहीं करता।" विपन्न बुद्धि कुछ चिन्तित स्वर में बोला।
"तुमने समर्थन देने में जरा भी देरी की तो अस्तित्व तो अपना समाप्त ही समझो"
अपना मतलव, मेरा भी........मैं कुछ सावधान हो गया।
हाँ आपका भी,....हमारा असली मकान मालिक जिसे षड़यन्त्र पूर्वक हमने निर्वासित करके छलपूर्वक पूर्वजों के मकान पर अवैध कब्जा कर रखा है। अब शक्ति संपन्न होकर और संवैधानिक पत्र लेकर आ गया है। अब थोड़ी ही देर में अपना सामान फेंकने ही वाला है। "कुछ उपाय करो विपन्न बुद्धि!" मैंने अपना पसीना पोंछते हुए कहा।
"एक ही उपाय है।"- विपन्न बुद्धि आश्वस्त भाव से कहे जा रहा था।
"हम सब पन्द्रह के पन्द्रह अतिक्रमणकारी सब भेदभाव भूलकर एक हो जाएँ। सभी अपने परिवार, रिश्तेदार और मित्रों के साथ मेरे समर्थन में खड़े हो जाएँ, और मुझे मकान मालिक बना दें तो कुछ समय तक और कब्जा रह सकता है।"
मुझे लगा विपन्न बुद्धि ठीक कह रहा है। कब्जा बनाये रखने के लिए इसके अलावा कोई और उपाय भी तो नहीं है।
मैंने कहा- "विपन्न बुद्धि! मैं तुम्हें समर्थन दूँगा। बताओं कौन से प्रकार का समर्थन चाहते हो?"
"कौन सा प्रकार?....... समर्थन मतलब समर्थन। इसमें प्रकार कहाँ से आ गया।" विपन्न बुद्धि कुछ खीझते हुए बोला।
मैंने उसे समझाने के स्वर में समर्थन के प्रकारों की खेप देते हुए कहा-
समर्थन मुख्यत: पाँच प्रकार का है। मुद्दों पर आधारित समर्थन। इस प्रकार का समर्थन केवल कहने का समर्थन होता है। इसमें समर्थन देने वाला अपनी जरा सी बात न मानने पर ही समर्थन वापस ले सकता है। राजनीति में इस प्रकार के समर्थन का कोई महत्व नहीं होता।
दूसरा प्रकार है आँख मूँदकर समर्थन। इसमें समर्थन देने वाले के हित जब तक पूरे होते रहते हैं, वह समर्थन पाने वाले के दोषों को देखकर भी आँखें बन्द कर लेता है। इस प्रकार का समर्थन पुलिस का अपराधियों के प्रति अक्सर देखा जाता है।
समर्थन का तीसरा प्रकार है (बाहर से समर्थन) इस प्रकार का समर्थन राजनीति में अत्यधिक लोकप्रिय है। यह समर्थन लेने और देने वाले दोनों को ही लाभदायक होता है। बाहर से समर्थन देने वाला भीतर से सामने वाले की जड़ काटता रहता है।
अब जो समर्थन का चौथा प्रकार है। वैसे उसका नाम तो बिना शर्त समर्थन है पर हकीकत में सबसे अधिक शर्तें इसी में होती हैं। इसके अन्तर्गत समर्थन लेने वाला, समर्थन देने वाले की तमाम अच्छी बुरी शर्तें मानने को बाध्य रहता है, और बाहर से खण्डन करता रहता है। प्रेमी के लिए प्रेमिका का समर्थन इसी श्रेणी के अन्तर्गत आता है।
समर्थन का पाँचवाँ और अन्तिम प्रकार है खुला समर्थन। यह समर्थन अत्यन्त खतरनाक किन्तु असरदार होता है। इस प्रकार का समर्थन राजनीतिज्ञ अपने चमचों और पड़ोसी देश अपने आतंकवादियों को देते हैं।
विपन्न बुद्धि मेरी बातों को सत्य नारायण की कथा की भाँति श्रद्धा पूर्वक सुनता रहा और फिर कुछ सोचते हुए बोला-
"जनाब! आप मुझे बाहर से बिना शर्त समर्थन दीजिए। मुझे आपकी सारी शर्तें स्वीकार हैं।" कहकर चला गया।
०००

Tuesday, March 06, 2007

शिक्षा का लोक व्यापारीकरण

शिक्षा का लोक व्यापारीकरण
भारत में पिछले पचास वर्षों में जितने नए-नए प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में किए गए हैं, उतने शायद किसी और अन्य क्षेत्र में नहीं। इन नए-नए प्रयोगों के फलस्वरुप लगातार शिक्षा में गुणात्मक ह्रास होता जा रहा है। पिछले तीन चार वर्षों में कुछ ज्यादा ही नए और विचित्र प्रयोग हो रहे हैं, जिससे शिक्षा के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लग गया है। इन प्रयोगों को नाम दिया गया है शिक्षा का लोक व्यापीकरण। विपन्न बुद्धि से जब लोगों ने इसका अर्थ जानना चाहा, तब उसने अपनी बुद्धि पर जोर लगाकर शून्य की ओर ताकते हुए कहा- देखिए मुझे लगता है इसमें कुछ मिस प्रिंट हो गया है। यह शिक्षा का लोक व्यापीकरण न होकर शिक्षा का लोक व्यापारीकरण होना चाहिए। पहले शिक्षा के क्षेत्र में सरकार को अपना दायित्व पूरा करने में बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता था और उससे कोई तात्कालिक लाभ भी नहीं होता था। शिक्षा एक ऐसा दूरगामी परिणाम वाला क्षेत्र है, जिसमें आज किए गए अच्छे या बुरे प्रयासों का परिणाम बीस साल बाद अगली पीढी को मिलता है। अब सरकार इतनी मूर्ख तो नहीं, कि शिक्षा में पैसा वह लगाए और लाभ अगली पीढ़ी को मिले।
इसीलिए उसने अपना धन बचाते हुए शिक्षा को व्यापार के लिए खुल्ला छोड़ दिया। इसके क्या परिणाम होंगे? अगली पीढ़ी भुगतती रहेगी। सांप का सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे। लिहाजा उसने शिक्षा का पूर्ण व्यापारीकरण कर दिया। अब कोई भी व्यक्ति एक कमरा किराये से लेकर हायर सेकेन्डरी स्कूल खोलकर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते हुए लाभ कमा सकता है। आज स्थिति यह है कि गली-गली शिक्षा की दूकानें खुल गईं हैं। अब किराने की दुकान वाले भी एक एक स्कूल खोल रहे हैं। पिछले दिनों हमारे एक पुराने मित्र मिले। हाल चाल पूछने पर उनने प्रसन्नता पूर्वक बताया- भैया जी की कृपा से एक देशी शराब की दुकान मिल गई है, और तीन स्कूल भी खोल लिए हैं। तीन स्कूल ? हमने आश्चर्य पूर्वक उन्हें देखा। स्कूल खोलना इतना आसान है क्या ? आप तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे स्कूल न होकर पान की दुकान खोलने की बात कर रहे हों ? पान की दुकान तो हमें बंद करनी पड़ी। मित्र ने कुछ खिन्न होकर बताया- उनने बडे लड़के को एक अच्छी सी पान की दुकान बड़े उत्साह से लगवाई थी। किन्तु लाख प्रशिक्षण देने पर भी चिरंजीव कत्था चूना का सही अनुपात नहीं सीख सके।
परिणाम स्वरुप ग्राहक मुँह फट जाने से पैसों की जगह दस गालियाँ देकर चलते बनते। साल भर तक घाटे में दुकान चलाई परंतु आशा के विपरीत कुँवर पान लगाना न सीखा तो नहीं सीखा। मजबूरन दुकान बंद करके स्कूल खोलना पड़ा। उसी में उसे प्रिंसिपल बना दिया है। वहाँ वह सफलता पूर्वक मुनाफे में दुकान चला रहा है। आसानी से अच्छा मुनाफा देखकर हमने दो स्कूल और खोल दिए। अब एक दो कॉलेज खोलने का सोच रहे हैं। दिन में शराब की दुकान बंद रहने से वहाँ के कर्मचारी फालतू रहते थे। अब दिन में वे स्कूल में पढ़ा भी देते हैं। दूसरों को तीन सौ रुपए देने पड़ते हैं। ये दो सौ में ही मान जाते हैं। स्कूल से सस्ता और कोई धंधा नहीं है। पढ़ाने वाले शिक्षक बी.एस.सी., एम.एस.सी. प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण जितने चाहो उतने दो तीन सौ रुपए में मिल जाते हैं। केवल चपरासी को जरुर सात आठ सौ देना पड़ता है। उनका कहना है,कि हम कोई पढ़े लिखे बेरोजगार थोड़े ही हैं, जो दो तीन सौ रुपए में काम करें मित्र की बातें सुनकर शिक्षा की दुर्दशा पर चिंतित होते हुए हम दूध लेने दूध डेरी की ओर चल दिए। वहाँ देखा जहाँ भैंसें बंधती थीं, टीन शेड पर बोर्ड लगा था 'महिषासुर महा विद्यालय।
` हमें लगा, कहीं भूल से गलत जगह आ गए हैं। महाविद्यालय में दूध का डिब्बा लेकर जाना ठीक नहीं हैं। लिहाजा हम चुपचाप उलटे पाँव लौटने लगे। तभी अंदर से आवाज आई-आइए विपन्न बुद्धि जी ! लौट क्यों रहे हैं ?
ये महोदय भूतपूर्व डेरी मालिक थे जो इस समय महाविद्यालय के प्राचार्य पद पर बैठे थे।
"आइये क्या? आप की डेरी कहाँ गई ? हम तो डिब्बा लेकर घूम रहे हैं।"
"क्या बताएँ भाई साहब ! दो भैंसें अचानक मर गईं, और आप तो जानते ही हैं कि भैंस खरीदना कितना मुश्किल है। इसलिए हमने डेरी तोड़कर कॉलेज खोल लिया है।" उसने कॉलेज की विशेषताएँ दर्शाने वाला पर्चा देते हुए कहा-
देखिए ये राष्ट्र का एकमात्र कॉलेज है, जहाँ इतनी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। कम्प्यूटर, ज्योतिष , योग, ध्यान, जूडो-कराटे, संगीत, सिलाई, बुनाई, कढ़ाई आदि अनेक प्रशिक्षणों की व्यवस्था है।
सभी छात्र छात्राओं को आखिरी पीरियड में एक गिलास भैंस का दूध निःशुल्क। सौ प्रतिशत सफलता की गारंटी। हमने पर्चे को ध्यान पूर्वक देखा, फिर भैंसों के तबेले को ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा- इस पशु शेड में बिजली पंखा, फर्नीचर कुछ भी नहीं है, इसमें छात्र बैठेंगे कैसे?
प्राचार्य जी ने हमें ऊपर से नीचे तक देखा और बोले- आप भी किस जमाने की बात कर रहे हैं ? भला कॉलेज के छात्र कक्षा में बैठते ही कब हैं ? ऊधम बाजी करना है, कहीं भी कर लेंगे। हाँ केवल परीक्षा में जरुर बैठना पड़ता है। उसकी भी हम ऐसी व्यवस्था कर देंगे कि एक ही घंटे में प्रश्न पत्र हल हो जाए। एक घंटा तो मुर्गी के दर्बे में भी बैठा जा सकता है। इन सब बातों से लगा कि सचमुच शिक्षा का लोक व्यापारीकरण हो गया है, आप भी अपना भाग्य आजमाइये और स्कूल खोल लीजिए।
०००

उच्च शिक्षा भयंकरा

उच्च शिक्षा भयंकरा
आज विपन्न बुद्धि अपनी एकमात्र पुत्री के बारहवीं परीक्षा उत्तीर्ण होने पर मिठाई बाँटने के साथ-साथ गुस्से में कुछ बड़बड़ाता भी जा रहा था। मैंने पहली बार किसी को प्रसन्नता और क्रोध एक साथ प्रकट करते हुए देखा था। मुझे लगा विपन्न बुद्धि गीता के 'समत्व योग` का पालन करते हुए ' सुख-दु:खे समे कृत्वा ` का व्यावहारिक प्रदर्शन कर रहा है। किन्तु दु:ख है किस बात का? और यदि है भी तो कुछ आगे पीछे प्रकट किया जा सकता था। मैंने उसे रोकते हुए पूछा- "विपन्न बुद्धि ! पहले यह बताओ, कि तुम अपनी लड़की के पास होने पर प्रसन्न हो या दुखी?"
वह मेरी ओर घूरते हुए गुस्से में बोला- प्रसन्न भी और दुखी भी.........प्रसन्न इसलिए हूँ कि मेरी लड़की सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी प्रथम श्रेणी में पास हो गई है, और दुखी इसलिए कि अब वह कॉलेज में एडमीशन लेने की जिद कर रही है। कहती है, 'उच्च शिक्षा प्राप्त करूँगी, ज्ञान प्राप्त करूँगी ।
` .....अब तुम्हीं बताओ ! कॉलेज से ज्ञान का क्या सम्बन्ध ? यदि सचमुच कालेज से ज्ञान मिलता होता तो भारत के प्रत्येक घर में हाथ पर हाथ धरे बैठा तथाकथित ज्ञानी अपने परिवार के लिए सिरदर्द नहीं बनता। अब उसे कौन समझाये कि कालेज में शिक्षा और ज्ञान के अलावा सब कुछ मिलता है। वहाँ इन्ट्रोडक्शन के नाम पर बेशर्मी, रैकिंग के नाम पर यातना , खुलेपन के नाम पर अभद्रता , फ्रेंकनेस के नाम पर सेक्स स्केण्डल , फ्रीडम के नाम पर स्वच्छन्दता, आधुनिकता के नाम पर ऊटपटाँग वेशभूषा , इमेज के नाम पर अकर्मण्यता, मनोरंजन के नाम पर बेहूदा हरकतें , कल्चर के नाम पर अमर्यादित आचरण , जागृति के नाम पर उद्दण्डता , फैशन के नाम पर नग्नता, पुरुषार्थ के नाम पर हत्या और बलात्कार ! क्या नहीं मिलता कॉलेज में?
विपन्न बुद्धि लगभग एक ही साँस में कॉलेज के समस्त गुणों का बखान ऐसे कर गया जैसे कोई औषधि विक्रेता अपनी दवाई का विज्ञापन देता हो।
तुम्हारी बुद्धि सचमुच विपन्न हो गई है विपन्न बुद्धि ! जो तुम हमारे महा पवित्र महाविद्यालय के विषय में ऊल जलूल बातें कह रहे हो। महाविद्यालय तो महान विद्याओं के केन्द्र होते हैं। यहाँ कोई महाविद्वान बनता है तो कोई महा मूर्ख, सारे महारथी यहीं से निकलते हैं महादानी से लेकर महाचोर तक, महा चतुर से लेकर महाधूर्त तक, सारी महान मूर्तियाँ यहीं गढ़ी जाती हैं। 'नो नॉलिज विदाउट कॉलेज` सूक्ति तो तुमने सुनी ही होगी ? सरकार ने अपने बजट का बहुत बड़ा हिस्सा फालतू तो नहीं लगाया ? कुछ न कुछ तो होता ही होगा वहाँ? रही बात उन गुणों की जिन्हें तुम दुर्गुण मान रहे हो।
इक्कीसवीं सदी में जीने के लिए अत्यावश्यक योग्यता है। अब नौकरी के तो कोई चान्स हैं नहीं और व्यापार सँभाल लिया है बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने, बची अब कृषि तो उसमें लगती है मेहनत; और पढ़े लिखे लोगों को मेहनत करना बर्जित है। लिहाजा अब एक ही व्यवसाय बच जाता है वह है राजनीति। राजनीति भारत का सर्वश्रेष्ठ लाभप्रद व्यवसाय बन गया है। धीरे धीरे इसका लोक व्यापीकरण भी हो रहा है। अब वह दिल्ली से लेकर गाँव के मुहल्ले तक पहुँच कर खूब फल फूल रहा है। इस व्यवसाय में बुद्धिजीवियो से लेकर गुण्डे, बदमाशों तक, फिल्मी कलाकारों से लेकर संन्यासियों तक सभी को समान अवसर प्राप्त है। और इस व्यवसाय में पूर्ण सफलता के लिए उपर्युक्त गुणों का होना अत्यन्त आवश्यक है। इसीलिए सरकार ने महाविद्यालयों में तोड़ फोड़, हड़ताल प्रदर्शन, मारपीट आदि पाठ्येतर क्रियाकलापों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की है। तुम भी अपनी पुत्री को बेहिचक कालेज में प्रवेश दिलाओ विपन्न बुद्धि। अन्यथा वह इक्कीसवीं सदी में कहीं की नहीं रहेगी।
विपन्न बुद्धि कुछ सोचते हुए बोला मित्र ! कॉलेज में पढ़ने का तो नहीं किन्तु एक बार जाने का मौका मुझे भी मिला है। तभी से कान पकड़ लिए कि भविष्य में ट्रक के नीचे घुस जाऊँ पर कालेज के फाटक के अन्दर नहीं जाऊँगा।
एक बार पड़ोस के लड़के को बुलाने कालेज गया था, वहाँ का हाल देखा तो मुझे लगा कि मैं किसी बहुत गलत जगह आ गया हूँ। कोई जोर जोर से सीटी बजा रहा था, कोई बेहूदा गाने गा रहा था, कोई मुझे देख कर कह रहा था 'तेरा क्या होगा कालिया ?
`। एक दादा किस्म का बड़े-बड़े बालों वाला, जिसे अन्य लड़के सीनियर कह रहे थे। फिल्मी स्टाइल में सिगरेट के छल्ले उड़ा रहा था, और जूनियर छात्रों की पिटाई कर रहा था। मैंने पूछ लिया- " भैया क्यों मारते हो उस लड़के को ? फिर क्या था..........मेरी ऐसी फजीहत हुई कि बताने योग्य नहीं है। तभी से मैं कालेज को उपद्रवियों की भीड़ इकट्ठा करने वाला कारखाना मानता हूँ। उपद्रव तक तो ठीक था पर आजकल तो प्रतिदिन महाविद्यालय परिसरों में हत्या और आत्महत्या के समाचार आ रहे हैं। कुछ दिन पहले एक महाविद्यालय परिसर में कुछ ज्ञानी महापुरुषों ने एक छात्रा को अपनी जीप से कुचल अपने पराक्रम का परिचय दिया था, और अभी हाल में बैतूल से राजधानी में ज्ञान प्राप्त करने गई स्मिता चन्देल की रहस्यमय मृत्यु हो गई। सरकार सिर्फ यह जानने में रुचि रखती है कि हत्या है या आत्म हत्या ? और पुलिस तो आत्महत्या सिद्ध करने में माहिर है ही। अब वह चाहे हत्या हो या आत्महत्या, बेचारे उन माँ बाप के लिए तो बेटी की हत्या ही है न?
ऐसे में तुम ही बताओ मैं अपनी इकलौती बेटी को मौत के मुँह में कैसे ढकेल दूँ।
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Sunday, March 04, 2007

राष्ट्र निर्माता की तथा कथा

राष्ट्र निर्माता की तथा कथा
बचपन में विपन्न बुद्धि जब अपने पिता के साथ पाठशाला में प्रवेश लेने पहुँचा था, तब किसी भी तीसमार खाँ के सामने न झुकने वाले अपने पिता को शिक्षक के श्रद्धापूर्वक चरण स्पर्श करते हुये देखकर, उसे समझ में आया कि शिक्षक कितना महान होता है। तभी से उसके बालमन में शिक्षक बनने की आकांक्षा अंकुरित हो गई थी। दुर्भाग्य से उसकी मनोकामना उस समय पूर्ण हो गई, जब उसे एक शासकीय विद्यालय में शिक्षक के पद पर नियुक्ति पत्र मिला। इस तथाकथित महान पद पर नियुक्ति को बड़ी प्रसन्नता पूर्वक सभी को बता रहा था। सोच रहा था, जीवन सार्थक हो गया। अब सारा जीवन अध्ययन और अध्यापन में व्यतीत होगा, और वह भी सम्मान के साथ। किंतु पड़ोस में रहने वाले एक सेवानिवृत्त शिक्षक ने उसके इस भ्रम को तोड़ते हुए, अपने जीवन के आधार पर उसे व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा देते हुए, सफल शासकीय सेवा के लिए कुछ गुर बताते हुए कहा- विपन्न बुद्धि! शासकीय शिक्षक, कहने सुनने को तो शिक्षक होता है, परन्तु उसका पढ़ने पढ़ाने से ज्यादा वास्ता नहीं होता। उसके प्रमुख कार्य वोटर लिस्ट, राशन कार्ड बनाना, गरीबी रेखा आदि अनेक प्रकार के सर्वे कराना, पशुगणना से जनगणना तक अनेक प्रकार की गणनाएँ, घेंघा उन्मूलन से लेकर ग्राम संपर्क अभियान तक नाना प्रकार के अभियानों में भागीदारी, पढ़ना बढ़ना, पल्स पोलियो जैसे अनेक कार्यक्रमों का संचालन, बाढ़ नियन्त्रण से लेकर भीड़ नियन्त्रण तक अपनी सेवा देना, सद्भावना रैली जैसे अनेक नीरस शासकीय कार्यक्रमों में छात्रों की भीड़ जमा करना आदि अनेक अत्यावश्यक कार्य होते हैं। इन सब क्रियाकर्मों को करने के बाद वह बच्चों को पढ़ा भी दे तो किसी को कोई एतराज नहीं है, किन्तु पूर्वोक्त कार्यक्रमों में उदासीनता कतई बर्दास्त नहीं की जाती। इन आदेशों में हमेशा दण्ड संहिता की किसी न किसी धारा का उल्लेख अवश्य किया जाता है।
सफल शिक्षक दण्ड संहिता की धाराओं से भयभीत होकर इन कार्यक्रमों में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देते हैं और विद्यालय में जाकर सोते हैं। ऐसे र्क>ाव्य निष्ठ शिक्षकों को कई राष्ट्रीय पुरस्कार दिये जाते हैं। इस पद को किसी भी प्रकार की ऊपरी इन्कम न होने के कारण समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। कोई भी नंबर दो का काम करने में असमर्थ होने के कारण इस प्राणी को अधिकांश लोग 'बेचारा मास्टर ` कहकर दया भी प्रदर्शित करते हैं।
सारा समाज इस घोर कलयुग में भी शिक्षक से सत्यवादी हरिश्चन्द्र होने की अपेक्षा रखता है। वर्ष में एक दिन शिक्षक दिवस मनाकर उसे राष्ट्र निर्माता, पथप्रदर्शक, साक्षात् परंब्रह्म आदि कहकर खजूर पर चढ़ा दिया जाता है।
खजूर का लटका हुआ यह बुद्धिजीवी सामाजिक मर्यादा, नैतिक मानदंड और पारंपरिक आदर्शों का लबादा ओढ़कर स्वभाव के विपरीत जीता है, जिससे उसकी बुद्धि भ्रमित, मन कुण्ठित और शरीर क्षीण हो जाता है। इसे अपने चेहरे पर गम्भीरता का मुखौटा लगाना अनिवार्य होता है। इसका सार्वजनिक स्थानों पर हँसना-हँसाना, मनोरंजन करना अपराध की श्रेणी में आता है। वह स्कूल में छात्रों के, शहर में पालकों के, ऑफिस में अधिकारियों के और घर में पत्नी के प्रश्नों के उत्तर देते देते अन्त में स्वयं एक प्रश्न चिह्न बन जाता है।
इन सभी को समय समय पर इसे आँख दिखाने का अधिकार होता है। अप्रैल का महीना इस वर्ग के लिए अत्यन्त घातक होता है। एक ओर इसी माह में परीक्षा का मानसिक तनाव, और दूसरी ओर घर में गेंहूँ, चावल आदि की व्यवस्था न कर पाने से पारिवारिक कलह के कारण रक्तचाप बढ़ा रहता है। परीक्षा संबन्धी दो तरफा खतरों से आशंकित इस वर्ग को रात में डरावने सपने आते रहते हैं। दैनिक समाचार पत्रों में शिक्षकों के सस्पेंड होने व उनके साथ मारपीट होने के समाचार आग में घी का काम करते हैं। फलस्वरूप हार्ट अटैक की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। सरकारी रिकार्ड के अनुसार शिक्षक की पत्नी हमेशा बीमार पाई जाती है। मासिक खर्च के अलावा सभी आवश्यक खर्चों के लिए भविष्य निधि ही इसका एक मात्र सहारा होती है, जिसे प्राप्त करने के लिए उसे तमाम परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। इसके लिए किसी न किसी का बीमार होना आवश्यक है। ऐसे समय में उसकी अर्द्धागिंनी ही काम आती है। भविष्य निधि निष्कासन के लिए उसे चार टोल टैक्स नाकों को पार करना पड़ता है। सारा समय बच्चों के साथ बिताने के कारण इस राष्ट्र निर्माता का मानसिक स्तर दिनोंदिन कृष्ण पक्ष के चन्द्रमा तरह घटता जाता है, और रिटायरमेंट तक उसकी बुद्धि, बालबुद्धि हो जाती है।
बच्चों के तरह तरह के प्रश्नों के उत्तर देते देते उसे सर्वज्ञ होने का भ्रम हो जाता है। इसलिए वह किसी भी विषय में अपनी अज्ञानता स्वीकार नहीं करता। किसी से कुछ पूछना, अपनी तौहीन समझने वाला यह गुरु, अत्यावश्यक नवीन जानकारियों से वंचित रह जाता है। फलस्वरूप वह सार्वजनिक व्यावहारिक जीवन में अपने आप को कूप मण्डूक की स्थिति में पाता है। छात्रों की गलतियाँ खोजते खोजते उसे समाज में चारों ओर गलतियाँ ही गलतियाँ नजर आने लगती हैं, जिन्हें बता बताकर वह लोगों का कोपभाजन बनता रहता है। जीवन भर ज्ञान बाँटने वाला यह राष्ट्र निर्माता अपनी उम्र के तीसरे दौर में ही समाज और परिवार से उपेक्षित होकर पंचत्व को प्राप्त हो जाता है।
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Friday, March 02, 2007

बूढ़ों का पढ़ना-बढ़ना आन्दोलन

बूढ़ों का पढ़ना-बढ़ना आन्दोलन
बोरी में स्लेट, पट्टियाँ और चाक के डिब्बे लिए हुए विपन्न बुद्धि कुछ घबराया हुआ सा कुछ जोर से चला जा रहा था। बैशाख की दोपहरी में लू से बचने के लिए सिर में आतंकवादी जैसा गमछा बाँधे, पसीना से तरबतर विपन्न बुद्धि को देखकर स्पष्ट रूप से समझा जा सकता था कि वह कोई बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करने जा रहा है। मुझे पता था कि विपन्न बुद्धि एक आदर्श और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक है। वह विद्यालय और छात्रों के हित में हमेशा प्रयत्नशील रहने वाला प्राणी है। हो सकता है कि छात्रों को ग्रीष्मावकाश के लिए कोई गृहकार्य आदि देने की व्यवस्था कर रहा होगा। हमने अपनी जिज्ञासा शान्त करने के उद्देश्य से पूछ ही लिया-
"क्यों भाई! अब तो स्कूल की परीक्षाएँ भी हो चुकीं। और परीक्षाफल भी आप बना चुके होंगे, फिर ये स्लेट और चाक लेकर इतनी धूप में कहाँ जा रहे हो? स्कूल को मारो गोली। अब तो पढ़ना बढ़ना आन्दोलन की बात करो। सरकार प्रौढ़ लोगों को साक्षर करने के लिए यह आन्दोलन युद्ध स्तर पर चला रही है- * 'पढ़ना-बढ़ना आन्दोलन *`।
यह कौन सा आन्दोलन है ? हमने भारत छोड़ो आन्दोलन से अँग्रेजी आन्दोलन तक अनेक आन्दोलनों के विषय में पढ़ा सुना है और उनका उद्देश्य भी समझ में आया। किन्तु यह पढ़ना बढ़ना आन्दोलन कुछ हजम नहीं हो रहा है। पढ़ने से बढ़ने का क्या सम्बन्ध? व्यवहार में तो ठीक इसका उल्टा ही दिखाई देता है। अधिकांश पढ़ने वाले शारीरिक रूप से कमजोर, आँखों पर मोटा सा चश्मा और रीढ़ की हड्डी झुकी हुई होने ये बढ़ने की बनिस्वत् सिकुड़ते से जाते हैं और बिना पढे लिखे आदमी को न जमाने की फिकर, अखबारी रोग से मुक्त, मीडिया के दुष्प्रभाव से सुरक्षित, दिन दूने रात चौगुने बढ़ते ही चले जाते हैं। आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में भी न पढ़ने वाले, पढ़ने वालों से आगे बढ़ रहे हैं।
अँगूठा छाप चिरौंजी लाल सरपंच बनकर अपने गाँव के उन मास्टर साहब को डाँट रहे हैं, जो उन्हें पढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया करते थे। गाँव के पढ़े लिखे युवकों के बेरोजगारी भत्तों के आवेदन पर शान से अँगूठा लगा रहे हैं। अब राबड़ी देवी को देख लीजिये। यदि वे पढ़ी लिखी होतीं तो क्या परिवार बढ़कर ग्यारह सदस्यीय हो पाता? राजनैतिक ऊँचाई भी बढ़ती ही जा रही है। विधान सभा में अच्छे अच्छे पढ़े लिखों को मार मारकर बौना बना रहीं हैं। दूसरी ओर सबसे ज्यादा पढ़े लिखे राजनेता थे, नरसिंह राव। चौदह भाषाएँ जानने के बाद भी उनका कद घटता ही गया , जब कि एक भी भाषा न जानने वालों का कद दिनोंदिन बढ़ता नजर आ रहा है। अत: पढ़ने से बढ़ने का सम्बन्ध दूर दूर तक सिद्ध नहीं होता। फिर ऊपर से आन्दोलन।
अभी तक हमने जनता को सरकार के विरुद्ध आन्दोलन करते तो देखा है, पर सरकार को आन्दोलन करते कभी नहीं देखा। सरकार को स्वयं संप्रभुता सम्पन्न होती है। उसकी इच्छा मात्र से ही सारे काम हो जाते हैं। उसे आन्दोलन करने की क्या आवश्यकता? यदि आन्दोलन करना ही था तो प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने के लिये करना था, क्योंकि प्राथमिक शिक्षा की स्थिति आज बहुत खराब है . प्रौढ़ लोगों को साक्षर करने की............पता नहीं कैसी सनक चढ़ी है, जो कभी साक्षरता अभियान, कभी प्रौढ़ शिक्षा, औपचारिकेत्तर शिक्षा और अब यह पढ़ना बढ़ना आन्दोलन में करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी परिणाम- 'आओ लच्छू जाओ लच्छू..........., इधर कच्छू न उधर कच्छू
` ।
विपन्न बुद्धि मेरी मूढ़ता पर हँसते हुये इस आन्दोलन के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए बोला- 'आ` उपसर्ग पूर्वक 'दोलन ` शब्द से आन्दोलन की व्युत्पत्ति हुई है। जिसका अर्थ है भली प्रकार से डोलना अर्थात गतिशील होना। जैसे कोई व्यक्ति निश्चेष्ट पड़ा हो और लोग उसे मृत घोषित कर दें तो वह अपने हाथ पैर हिला डुलाकर यह सिद्ध करता है कि अभी वह मरा नहीं है। उसी प्रकार कोई संस्था जब निष्क्रिय हो जाती है और लोग उसके अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाने लगते हैं तब उसे अपने जीवित होने का प्रमाण देने के लिये आन्दोलन करना पड़ता है।
आन्दोलन के उद्देश्य भी हाथी के दाँतों की तरह दो प्रकार के होते हैं- खाने के और दिखाने के और। दिखाने के लिये कोई भी उद्देश्य बताया जा सकता है। किन्तु मुख्य उद्देश्य खाने का ही होता है। दिखाने वाला उद्देश्य पूरा हो या न हो, पर असली खाने वाला उद्देश्य तो पूरा हो जाता है। इसीलिये अक्सर देखने वाले लोग जिन आन्दोलनों को असफल मानते हैं, आन्दोलनकर्ता उसे सौ प्रतिशत सफल बताते हैं। इस भ्रान्ति का कारण लोगों को उनके असली उद्देश्य का पता न होना ही है। अब रही बात पढ़ने के साथ बढ़ने की तो उसका भी एक गूढ़ अर्थ है। सरकार ने देखा कि छोटे बच्चों को साक्षर करने पर बहुत बड़ी धनराशि व्यर्थ खर्च हो जाती है। यह काम उनके प्रौढ़ हो जाने पर आसानी से पूरा हो जाता है। इसके लिये न भवन की जरूरत, न किसी उपकरण की आवश्यकता और न शिक्षक की अनिवार्यता। इसके लिये मोहल्ले के किसी एक ऐसे प्राणी की तलाश की जाती है जो ठीक से पढ़ भी न पाया हो, और कोई काम भी न कर सकता हो। उसे बहला फुसला कर गुरु जी बनाया जाता है जो अपने चाचा, बाबा को मना मनाकर किसी चबूतरे पर इकट्ठा करते हैं और उनके कान में मंत्र फूँकते हैं- 'पढ़ो और बढ़ो `।
देखते ही देखते वह निरक्षर साक्षर होकर आगे बढ़ जाता है। इस महान कार्य के बदले गुरु जी को मात्र सौ रुपए देने का आश्वासन भर देना होता है। हालांकि गुरु जी को साक्षरता अभियान में दिखाये गये हसीन सपनों की भाँति इस अश्वासन पर भी भरोसा नहीं हो पा रहा है। फिर भी बैठे से बेगार भली उक्ति को चरितार्थ करते हुए इस पवित्र कार्य में जुट जाते हैं।
इस तरह कुछ महीनों में ही साक्षरता का प्रतिशत बढ़ जाता है। जब इतने सस्ते में ही सरकार को अपना लक्ष्य मिल जाता है तो भला वह खर्चीली प्राथमिक शिक्षा पर क्यों ध्यान दे ? अब तो बस पढ़ना बढ़ना आन्दोलन ज़िन्दाबाद।
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Monday, February 05, 2007

एक सरकारी तीर्थ यात्रा

एक सरकारी तीर्थ यात्रा
पिछले दो तीन दिनों से विपन्न बुद्धि के द्वारा एकत्रित की जा रही विचित्र-विचित्र सामग्री और उसके असंतुलित व्यवहार से घर के सदस्यों को उसके मानसिक रूप से विक्षिप्त होने की आशंका सताने लगी थी। उसकी पत्नी घबराई हुई किसी अच्छे से मनोचिकित्सक का पता पूछने के उद्देश्य से हमारे पास आई और बोली- "भाई साहब आप ही कुछ कीजिये ! मुझे तो उनकी हालत कुछ गड़बड़ सी दिख रही है। अपने कमरे को आलतू फालतू सामान से भरे जा रहे हैं। पूछने पर काटने को दौड़ते हैं। अन्दर ही अन्दर कुछ डरे हुए मालूम पड़ते हैं। रात में सपने में सम्पर्क सम्पर्क बड़बड़ाते हैं।" मुझे भी लगा कि सारे ग्रहों के एक लाइन में आ जाने के कारण गर्मी भी कुछ ज्यादा ही पड़ रही है। हो न हो विपन्न बुद्धि सरक गया लगता है। मैं तुरन्त उसे देखने उसके घर गया। वहाँ सचमुच में उसकी पत्नी के बताये के अनुसार विपन्न बुद्धि अजीबो गरीब साजो सामान को व्यवस्थित करने में लगा था। एक कुएँ से पानी खींचने वाली रस्सी, एक बड़ा सा घड़ेनुमा लोटा, बारह तान का छाता, किसान टार्च, दोनों ओर सामान रखकर कंधे पर लटकाई जाने वाली खंदली, जिसमें अधिक समय तक खराब न होने वाली खाद्य सामग्री सतुआ, मुरमुरा, फल्ली दाने आदि भर रखी थी।रस्सी से बँधा हुआ ढोलक नुमा बिस्तर आदि देखकर मुझे समझने में देर नहीं लगी कि विपन्न बुद्धि निश्चित रूप से नर्मदा की परिक्रमा करने जा रहा है। परन्तु इतनी भयंकर गर्मी में परिक्रमा का विचार मेरी समझ से बाहर था।मैंने पूछा- "विपन्न बुद्धि! परिक्रमा करने का सबसे उचित समय दशहरा होता है। तुमने यह जानलेवा मौसम क्यों चुना? ""मैं परिक्रमा पर नहीं, एक यात्रा में जा रहा हूँ" विपन्न बुद्धि अपनी पीठ पर बिस्तर बाँधते हुये बोला।"कौन सी यात्रा......? बद्रीनाथ की यात्रा का भी यह समय नहीं है। चारों धाम यात्रा रेलगाड़ी भी कभी की जा चुकी है। रथयात्रा पंचकोसी यात्रा आदि सभी यात्राएँ ठंडे मौसम में ही सम्पनन होती हैं। फिर तुम्हें इस विपरीत मौसम में कौन सी यात्रा का शौक चर्राया है?" हमने कुछ खीझते हुये पूछा।"मैं अपनी मर्जी से थोड़े ही जा रहा हूँ" उसने अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहा। अनिच्छा से की जाने वाली यात्रा तो बस एक ही है, 'शवयात्रा` उसी में सभी लोग अनिच्छा पूर्वक जाते हैं।.......परतु उसके लिये इतनी तैयारी की क्या आवश्यकता है? मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा। विपन्न बुद्धि लम्बी साँस खींचते हुए बोला- नहीं.....मित्र! शवयात्रा तो दो-नीन घण्टे में पूरी हो जाती है। 'ग्राम संपर्क अभियान यात्रा` पर ! ग्राम संपर्क यात्रा? यह कौन सी तीर्थ यात्रा है? इसकी विधि क्या है? कब की जाती है? कैसे की जाती है? और इसका फल क्या है? ......कृपा करके इसके महत्व पर भी प्रकाश डालिये। हमने उत्सुकता पूर्वक जिज्ञासा प्रकट की।विपन्न बुद्धि ने अपनी यात्रा में काम आने वाले प्रपत्रों को पलटते हुए इस यात्रा के प्रयोजन, विधि? समय और फलाफल पर विस्तार पूर्वक बताया- 'ग्राम संपर्क अभियान यात्रा` एक सरकारी यात्रा है इसमें पूरी की पूरी सरकार ग्रामों से संपर्क करने के लिये टूट पड़ती है। सरकार के तीन प्रकार के यात्री दल होते हैं। पहला दल उन कर्मचारियों का होता है जो भीषण गर्मी की तेज लपटों के साथ साथ पिछली यात्रा की समस्याओं के हल न होने से उत्पन्न ग्राम वासियों के क्रोध की ज्वाला को सहन करते हुए पैदल सेना की तरह आगे आगे चलता है। कुछ सरकार से और कुछ जनता से भयभीत यह दल थका हारा जब गाँव में प्रवेश करता है तब गाँव के कुत्ते उन्हें भौंक भौंक कर डरा देते हैं। यह दल गाँव में घर घर जाकर लोगों से समस्या पूछता है और खरी खोटी सुनता है। पिछली बार की तरह सभी समस्यायें हल करने का आश्वासन भी देता है। जहाँ कही पुराने अनुभवी सरपंच होते हैं वहाँ इस दल को भोजन भी प्राप्त होता है, अन्यथा अपने साथ रखा सतुआ खाकर किसी पेड़ के नीचे विश्राम करता है।दूसरा दल उन बड़े अधिकारियों का होता हे जो प्रात: चाय नाश्ता करके शासकीय वाहन द्वारा छापामार शैली में किसी भी ग्राम से अचानक संपर्क करता है। चौपाल पर नागरिकों को एवं यात्री दल को एक साथ बैठाकर यह दल कुछ रटे रटाये प्रश्न पूछता है और उर सुनकर कर्मचारियों को डाँटता है।एक दो कर्मचारियों को सस्पेण्ड करता हे, और अगले ग्राम की ओर प्रस्थान करता है। निलम्बित कर्मचारियों की संख्या ही इस दल की यात्रा का प्रमाण होती है। तीसरा और अन्तिम दल मुख्य सरकार का होता है। जो हेलीकॉप्टर द्वारा अचानक किसी भाग्यशाली ग्राम का ऊपर से संपर्क करता हे। यह दल हेलीकॉप्टर से उतर कर कहीं क्रिकेट खेलने लगता है और कहीं कबड्डी। यह दल कब, कहाँ और कैसे टपक पड़ेगा कहा नहीं जा सकता। इसलिए प्रदेश के समस्त ग्राम इस दल की प्रतीक्षा में आकाश की ओर तोकते रहते हैं। जब कहीं हेलीकॉप्टर की आवाज सुनाई देती हे तब उस ग्राम के ग्रामवासी प्रसन्न और पैदल यात्री संशकित हो जाते हैं। किन्तु यदि हेलीकॉप्टर बिना उतरे आगे बढ़ जाता है तब पैदल यात्री प्रसन्न और ग्रामवासी उसी प्रकार दु:खी होते हैं जैसे कोई प्रेमी अपने सामने से प्रेमिका की डोली जाते हुए देखकर दु:खी होता है।यह दल जहाँ उतरता हे वहाँ किसी को फुटबॉल, किसी को हॉकी, किसी को चश्मा आदि देकर सारे ग्राम को समस्या हीन कर देता है।ग्राम के लोग सरकार के साथ फोटो खिंचवाकर धन्य हो जाते हैं। इस प्रकार से तीनों सरकारी दल ग्राम संपर्क यात्रा पूर्ण कर साल भर के लिये समस्या मुक्त हो जाते हैं। इस यात्रा पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, जिसेस अर्थ संकट से जूझती सरकार की ग्रामों के प्रति उदारता प्रकट होती है।इस यात्रा से सरकार ग्रामों की, और ग्रामवासी सरकार की असलियत जान ल्रते हैं। कर्मचारियों का स्वास्थ्य परीक्षण भी हो जाता है। समाचार पत्रों में हल्ला हो जाने से लगने लगता है कि कुछ हो रहा है। आशावादी लोगों को तसल्ली हो जाती है। आजकल कुछ ग्राम इस यात्रा का बहिष्कार भी करने लगे हैं। वे इन्हें समस्याएँ बताना ही नहीं चाहते, फिर भी ये दल जबरन समस्या पूछते हैं जिससे कोई बड़ी समस्या खड़ी होने का डर है।इस प्रकार विपन्न बुद्धि तैयार होकर हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए 'ग्राम संपर्क अभियान यात्रा` पर निकल पड़ा।००००००००००००००००

दुनिया के चोर उचक्कों एक हो जाओ

दुनिया के चोर उचक्कों एक हो जाओ
आज मैं पूरे आत्म विश्वास से सारी दुनिया के उन छोटे-बड़े चोर उचक्कों का आह्वान करता हूँ कि, हे दुनिया के चोर उचक्कों एक हो जाओ, और गर्व से कहो 'हम चोर हैं।` अब समय आ गया है कि हम अपनी ताकत पहचाने, हमारी एक महान परम्परा है, एक सार्वभौमिक संस्कृति है। पूर्व हो या पश्चिम, उत्तर हो या दक्षिण, हमारी एक निश्चित कार्य पद्धति है। हमारे साथ आदिकाल से ही तथाकथित सभ्य समाज द्वारा अत्याचार किया जाता रहा है। विश्व के प्रत्येक राष्ट्र में हमारी जाति की अच्छी खासी संख्या है फिर भी हमें तीसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। हमें आज भी अपना व्यवसाय चोरी छुपे करना पड़ रहा है। जहाँ एक ओर विकसित देशों में हमारी प्रगति पर तरह तरह के अवरोध उत्पन्न किये जाते रहे हैं वहीं विकासशील देशों में भी हमारे साथ अमानवीय व्यवहार किया गया है।संसार के सभी देशों ने हमारे एक से एक होनहार प्रतिभावान चोरों को या तो जेलों में कैद कर रखा है या फिर उन्हें पत्थर मारकर अपमानित किया जाता रहा है। कुछ पिछड़े देशों में तो हमारे भाइयों के हाथ काट देने तक के कानून बना रखे हैं।हमारे व्यवसाय का न तो कोई पशिक्षण संस्थान है और न ही किसी यूनिवर्सिटी में कोई व्यावसायिक पाठ्यक्रम है। इसके बाद भी हमारे कर्तव्यनिष्ठ कर्मवीर चोर भाइयों ने हमारा परम्परागत चौरकर्म को नई नई तकनीकि विकसित करके दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति करते हुए अपनी संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि की है। मैं बड़े गर्व से कहता हूँ कि यदि धर्म निरपेक्ष कहीं कोई है तो वह हमारी जाति ही है। हम चोरी करते समय धर्म, रंग, वर्ग, संप्रदाय आदि में भेदभाव नहीं करते। हमारी भाषा भिन्न हो सकती है, वेशभूषा भी अलग है लेकिन अन्दर से हम सब एक हैं। अनेकता में एकता सच मायने में हमारे समाज में ही देखने को मिलती है। पहले हमारा कार्यक्षेत्र सीमित हुआ करता था किन्तु आवागमन के साधन और सूचना प्रौद्यौगिकी के विस्तार से आज हम अन्तर्राष्ट्री नेटवर्क स्थापित करने में सफल हो गए है। इस तरह 'वसुधैव कुटुम्बकम्` की भावना का परिपालन हमने ही किया है। उक्त विचार चेन्नई में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय चोर महासभा का उद्घाटन करते हुए मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित विपन्न बुद्धि ने प्रकट किये। अन्तर्राष्ट्रीय चोर महासंघ की स्थापना की आवश्यकता पर बल देते हुए उसकी स्पष्ट रूपरेखा समझाते हुए उसने कहा- "भाइयो! वैसे तो दुनिया के अधिकांश देशों ने हमारी व्यावसायिक गतिविधियों को रोकने के लिये पुलिस को आधुनिक संसाधानों से सक्षम कर लिया है। ऐसी स्थिति में मात्र केवल भारत में ही एक आशा की किरण दिखाई देती है। यहाँ का संविधान बड़ा दयालु है, वह हमारे विशाल समाज को पर्याप्त संरक्षण देता है। यहाँ की पुलिस से भी जितने मित्रतापूर्ण सम्बन्ध हमारे हैं उतने और किसी के नहीं हैं। हम सदैव अप्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे का सहयोग करते रहते हैं। समय आने पर वह हमें जनता से बचाती है। परिणामस्वरूप हम दोनों ही निरन्तर प्रगति कर रहे हैं।यहाँ वकीलों की भी एक बड़ी संख्या है। सौभाग्य से वे भी हमारे सहयोगी हैं। उनकी और हमारी आजीविका का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। वह एक तरह से हमारे अघोषित संरक्षक हैं। मानव अधिकार परिषद जैसी अनेक संस्थायें भी हमारे बचाव में खड़ी रहती हैं। भारत की न्याय पालिका भी हमारे लिये अत्यन्त उदार हृदय वाली हैं। यहाँ चार पाँच प्रकार की निचली और ऊँची सम्माननीय अदालतें होती हैं जो हमारे प्रति अधिक संवेदनशील तो हैं किन्तु कभी कभी कोई अदालत गलती से किसी चोर को सजा सुना देती है तो ऊँची अदालत बिना समय लगाये उस पर रोक लगाकर हमें रिलीफ दे देती है।यहाँ की जनता के हृदय में भी हमारे प्रति बड़ा आदर है। इसीलिये ये हमें नेता चुनने में भी भेदभाव नहीं करती। इन सब के सहयोग से आज भारत में हमारी संख्या लगभग ८० प्रतिशत तक जा पहुँची है। हालांकि जनगणना में चोर व्यवसाय की गणना नहीं की जाती परन्तु यह सभी जानतें कि आज़ादी के बाद हमारी संख्या सर्वाधिक बढ़ी है। अब सही मायने में हम बहुसंख्यक है। वैसे तो भारत की सारी राजनीति हमारे नियंत्रण में ही चल रही है परन्तु फिर भी सीधा सीधा प्रतिनिधित्व कम ही है। अभी संसद में हमारी उपस्थिति मात्र १० प्रतिशत ही हो सकी है। बड़ी मुश्किल से हमारे दो नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुँचे हैं। अभी हमारे एक सम्माननीय विशिष्ट सदस्या को विधान सभा में प्रवेश करने से रोक दिया गया। वह तो अच्छा हुआ कि सौभाग्य से वहाँ महामहिम राज्यपाल एक संविधान की विशेषज्ञ निकली जिन ने एक मिनट में सजा याफ्ता को सीधे मुख्यमंत्री बना दिया। संविधान की रहस्यमयी धाराओं को हर कोई थोड़े ही समझ पाता है। और कोई नासमझ होता तो दूसरों से सलाह मशविरा करने में एक दो दिन देर कर ही देता। इसी प्रकार हमारे एक प्रसिद्ध चारा चोर के पीछे पूरी सी०बी०आई हाथ धोकर पीछे पड़ी है। उसे जेल पहुँचाने की पूरी तैयारी कर ली थी। वह तो भला हो हमारी बड़ी अदालत का जिसने येन वक्त़ पर उसे पूर्ण सुरक्षा प्रदान कर दी ।अरे भाई " मनुष्य का आहार चुराने वाले मुर्गी चोरों और भुट्टे चोरों को पकड़ो तो पकड़ो, पर मुर्गी और सुअरों का चारा चुराने वालों पर इतनी ज्यादती क्यों? भारत एक धर्म निरपेक्ष प्रजातांत्रिक देश है। बहुमत ही इसकी शक्ति है और बहुमत अब हमारे साथ है। बहुजन समाज होने का दाबा भले ही कोई करे लेकिन बहुजन समाज हम चोरों का ही है। कमीं सिर्फ एक मंच बनाने की है। अभी हमारे चोर भाई असंगठित हैं, उन्हें अपनी सही संख्या का पता नहीं है क्योंकि वे सभी अपने अपने काम में व्यस्त रहते हुए केवल अपने ही क्षेत्र में परिचित होते है। उन्हें नहीं मालूम कि स्वतंत्रता के पश्चात परम्परागत चोरी के अलावा चोरों ने नए नए क्षेत्र विकसित कर लिये है।, जैसे रेलों के विकास के साथ बैगन चोर और कोयला चोरों की संख्या बढ़ी है। इधर लकड़ी चोरों ने अपने कीर्तिमान स्थापित किये हैं। चन्दन चोर वीरप्पन भाई की ही इतनी सेना है कि दो प्रदेश सरकारों को नचा नचा दे रहे हैं। दूसरी तरफ वाहन चोरों का भी एक बड़ा गिरोह सक्रिय है, उधर शक्कर चोर, यूरिया चोर पर्याप्त चर्चा में हैं।कर चोरें और बिजली चोरों ने तो सभी सरकारों की नाक में दम कर रखा है। शासकीय कार्यालयों में कामचोरों की भी कमी नहीं है। धार्मिक स्थानों में मूर्तिचोरों और जूताचोरों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। आजकल दिल चुराने वाले मजनुओं की भी संख्या बढ़ती जा रही है। विद्यार्थियों में चिटचोरों के बढ़ते प्रभाव से सारा शिक्षा विभाग अस्त व्यस्त है। इस तरह आप जहाँ भी जायें, चोर ही चोर नजर आएँगे। इसलिये भाइयों अब हमारा ही बहुमत है। यदि हम सब संगठित हो जाएँ तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में हमारा ही पूर्ण वर्चस्व होगा। मैं फिर एक बार आह्वान कर रहा हूँ-............हे दुनिया के चोरों एक हो जाओ.......और गर्व से कहो ................................हम चोर हैं।
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